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Friday, June 29, 2018

वहां रोज़ मछली खाते, यहां भात और झोलदार सब्ज़ी भी बड़ी बात है

ये तबका लिली के फूलों, चांदनी या कविता की बात नहीं करता. क्रांति की आग भी इनके भीतर दिखाई नहीं देती. दिखता है तो दिन से रात और रात से दिन तक सुलगते-भीगते मौसमों और धूल में हाड़तोड़ काम का जज़्बा. छूने पर मैली पड़ें, ऐसी पारदर्शी इमारतें बनाते ये मजदूर भी ख्वाब देखते हैं- छोटे से घर का, बच्चों की किताबों का और भरपेट खाने का.

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